पुण्य | दक्षिणा देने से ही क्यों मिलता है धार्मिक कर्मों का फल। tellers.live


 

पुण्य | दक्षिणा  देने से ही क्यों मिलता है धार्मिक कर्मों का फल। tellers.live

यजुर्वेद में एक बहुत सुंदर मन्त् है, वह कहता है ब्रह्मचर्य आदि व्रतों से ही दीक्षा प्राप्त होती है अर्थात् ब्रह्मविद्या या किसी अन्य विद्या में प्रवेश मिलता है। फिर दीक्षा से दक्षिणा अर्थात् धन समृद्धि आदि प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। यहाँ दक्षिणा मिलने का अर्थ है दक्षिणा देना, वेद ने यही माना है कि जो देता है उसे देवता और अधिक देते हैं। जो नहीं देता है, देवता उसका धन छीनकर दानियों को ही दे देते हैं। फिर कहता है दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है, और श्रद्धा से सत्य प्राप्त होता है। क्रम है, व्रत –> दीक्षा –> दक्षिणा –> श्रद्धा –> सत्य मध्य में दक्षिणा है, एक बार दीक्षित हो गए, मार्ग पर बढ़ गए, और फिर दक्षिणा में लोभ किया तो मार्ग नष्ट हो जाता है। इसलिए विद्वानों, गुरु, आचार्य को दक्षिणा और पात्रों को दान देने से ही मार्ग आगे प्रशस्त होता है। दक्षिणा देने से अपने गुरु, आचार्य में श्रद्धा बढ़ती है। गुरु भी अपनी अन्य सांसारिक चिंताओं से मुक्ति पाकर शिष्य या यजमान के कल्याण के लिए और उत्साह से लग जाते हैं और अंततः सत्य से साक्षात्कार कराते हैं।

 अब दक्षिणा क्या होनी चाहिए, इस पर शास्त्र का स्पष्ट मत है कि दक्षिणा यथाशक्ति, यथासम्भव ही होनी चाहिए। न अपनी शक्ति से कम होनी चाहिए न ज्यादा की कोई आवश्यकता है। सनातन धर्म की समाज संरचना ऐसी थी कि अपरिग्रही ब्राह्मणों, पुरोहितों, ज्योतिष आदि आचार्यों का दायित्व समाज के ऊपर था। समाज उन्हें अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा द्वारा पोषित करता था। बदले में वे समाज को अपने ज्ञान से पोषित करते थे। पर जैसे ही यजमान में कृपणता आई और आचार्य में लोभ आया वैसे ही यह व्यवस्था टूट गई। इससे हानि हुई कि जिनका कार्य पुरोहित बनकर कर्मकाण्ड कराना था, गुरु बनकर पढ़ाना लिखाना था, ज्योतिषाचार्य बनकर लोगों को जीवन के प्रति सचेत करके मार्ग दिखाना था, उन्हें यजमानों से उचित दक्षिणा न मिलने के कारण अपना घर चलाने के लिए दूसरे व्यवसायों अपनाने पड़े और इन विद्याओं का नाश हुआ। आज सब लोग एक पक्षीय रूप से तो देखते हैं कि ब्राह्मण पौरोहित्य ठीक नहीं करते, ज्योतिषी लूटते हैं और झूठ बताते हैं; लेकिन वे खुद का दोष नहीं देखते कि क्या यजमान धर्म का उन्होंने पालन किया? क्या यथाशक्ति, यथासम्भव वे इन आचार्यों को दक्षिणा देते हैं? आपके कोई जान पहचान के ज्योतिषी हैं तो आप चाहते हैं कि उन्हें मुफ्त में कुण्डली दिखा दें, उनसे इमोशनल अत्याचार करते हैं। यह नहीं देखते कि ज्योतिष विद्या प्राप्त करने के लिए कितने हज़ार घण्टे उन्होंने अध्ययन की तपस्या की होगी। वे आपकी कुण्डली को समझने में जो एक दो घण्टे खर्च करते हैं आप चाहते हैं उसकी कीमत 11, 51, या 101 रुपए दे दें। घर में कोई पूजापाठ है तो आप चाहते हैं कि 101 रुपए में पण्डित मान जाए। वह आपके घर दूर से एक दो घण्टे खर्च करके आता जाता है, 2 घण्टे खर्च करके पूजा कराकर अपना पूरा दिन खर्च करता है और बदले में 101, 151 रुपए में आप उसे विदा करना चाहते हैं। क्या यह आपकी यथाशक्ति-यथासम्भव है? यदि सब लोग उन पुरोहितों या ज्योतिषियों को बस 101 रुपया ही दें तो हर पर 2 घण्टे लगाकर वह केवल 5-6 लोगों की कुंडली या पूजापाठ ही तो करा पाएगा? इससे महीने में 500 प्रतिदिन हिसाब से केवल 15 हज़ार या कुछ अधिक होंगे। इसमें वह अपना घर कैसे चलाएगा? और शांति से नहीं चला पाएगा तो अपनी विद्या और यजमान पर ध्यान कैसे देगा? फिर जब वह मजबूरी में अपनी दक्षिणा फिक्स करे तो आप उसे पाखण्डी धंधेबाज कहते हो? यह क्या खुद का फोड़ा न देखकर दूसरे की सूजन निहारने वाली बात नहीं है?

 

आप ज्योतिषी से तो उम्मीद करते हैं कि वह पाराशर स्मृति के अनुसार चलकर दक्षिणा न मांगे पर जब वही शास्त्र ज्योतिष आदि विद्याओं के लिए यथाशक्ति दक्षिणा देने की बात कहते हैं तो उसे नहीं मानते। तब आप 11 रुपए देकर कहते हैं बिना दक्षिणा दिए पाप लगता है पण्डितजी यह रख लीजिए। अरे 11 रुपए का एक ज्यूस भी नहीं आता है, क्यों उन जान पहचान के ज्योतिषियों और पुरोहितों को अपमानित करते हैं 11 रुपए देकर?? क्यों खुद के सिर पाप चढाते हैं। वेद ने स्पष्ट कहा है, “इन्द्र ऐसे कृपण/कंजूस लोगों को पैर से घास फूंस की तरह रौंद देता है।” मैं यह नहीं कह रहा कि सभी ज्योतिषी बहुत विद्वान या सारे ही पुरोहित बहुत अच्छे हैं। पर उनमें कई वास्तव में अच्छे हैं जिन्हें समाज हतोत्साहित करता है। ऐसे में वे अपने अध्ययन पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें भी अपनी सांसारिक जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरे रास्ते अपनाने पड़ते हैं। असंतुष्ट होकर आचार्य कभी भी कृपा नहीं कर सकते। सच्चे मन, पूर्ण विश्वास और उन्हें संतुष्टि देकर ही उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है। उनके द्वारा बताए गए उपाय भी तभी सफल होते हैं। पुराणों में एक कथा आती है, नारद जी ने प्रश्न किया कि दक्षिणाहीन कर्म का फल कौन भोगता है? तो भगवान नारायण ने उत्तर दिया,“मुने! दक्षिणाहीन कर्म में फल ही कैसे हो सकता है? क्योंकि फल प्रसव करने की योग्यता तो दक्षिणावाले कर्म में ही है। बिना दक्षिणा वाला कर्म तो बलि के पेट में चला जाता है, अर्थात् नष्ट हो जाता है। आचार्यों से वैदिक विद्याओं का प्रयोग करवाना, पौरोहित्य करवाना आदि यज्ञ का अंग है।मनुस्मृति में महाराज मनु का स्पष्ट शब्दों में आदेश है,

और पुण्य कर्मों को करे पर कम धन वाला यज्ञ न करे। न्यून/कम दक्षिणा देकर कोई यज्ञ नहीं करना चाहिए। कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने से यज्ञ की इन्द्रियाँ, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश करती हैं।”

अन्यत्र भी कहा है,“दक्षिणाहीन यज्ञ दीक्षित को नष्ट करदेता है।” वेद में भी कहा गया है,“प्रयत्न से उत्तम कर्म करने वाले के लिए जो योग्य दक्षिणा देता है, अग्नि उस मनुष्य की चारों ओर से सुरक्षा करता है।”

 

कंजूस कभी भी ज्ञानसम्पन्न नहीं हो सकते, वे सदा ही अंधकार में ठोकर खाते फिरेंगे। जो यज्ञ के कार्य के लिए अपना धन समर्पित करते हैं, वे उन्नति करते हैं और अदानशील व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं।”

 

इसलिए वैदिक विद्याओं को बचाने के लिए, सनातन धर्म की रक्षा के लिए केवल दोषारोपण न करें। आपके लिए वैदिक विद्या का प्रयोग करने वाले आचार्यों, अन्य योग्य सनातनी संस्थाओं और व्यक्तियों को उचित दान दक्षिणा देने में कंजूसी न करें। बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहाँ धनबचा लेंगे। फालतू जगहों पर कंजूसी करेंगे तो धन बढ़ेगा, वैदिक विद्या और धर्म के कार्य में कंजूसी करेंगे तो धन घटेगा। इधर तो देने से ही बढ़ता है। इसमें शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है।

 

सन्दर्भ {सोजन्य से (लिया गया है)} :

 

१. यजुर्वेद 19.30

२. ऋग्वेद 5.34.7

३. अथर्ववेद 20.63.5/ऋग्वेद 1.84.8

४. ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड, अध्याय 42

५. मनुस्मृति 11.39/40

६. स्कन्दपुराण 5.33.27

७. ऋग्वेद 1.31.15

८. ऋग्वेद 4.51.3

छोटे और बड़े के भेद से अठारह पुराण बताये गये हैं। १. ब्रह्मपुराण, २. पद्मपुराण, ३. विष्णुपुराण, ४. शिवपुराण, ५. भागवतपुराण, ६. भविष्यपुराण, ७. नारदपुराण, ८. मार्कण्डेयपुराण, ९. अग्निपुराण, १०. ब्रह्मवैवर्तपुराण, ११. लिंगपुराण, १२. वाराहपुराण, १३. स्कन्दपुराण, १४. वामनपुराण, १५. कृर्मपुराण, १६. मत्स्यपुराण, १७. गरुडपुराण और १८. ब्रह्माण्डपुराण[4]

आईये जानते हैं शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा SHIV JI BHOLE BABA tellers.live

आईये जानते हैं  शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा  SHIV JI BHOLE BABA tellers.live


*द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र*

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥

 



इस स्तोत्र के जप मात्र से व्यक्ति को शिवजी के साथ ही सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। जो भी व्यक्ति इस स्तोत्र को नियमित जप करता है, उसे महालक्ष्मी की कृपा हमेशा प्राप्त होती है

क्या आप जानते हैं भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग देश के अलग-अलग भागों में स्थित हैं। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। इन ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मातर के सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।

*1..सोमनाथ...*

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी।

*2..मल्लिकार्जुन...*

यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्री शैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

*3..महाकालेश्वर...*

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है।

*4..ओंकारेश्वर...*

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

*5..केदारनाथ...*

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

*6..भीमाशंकर...*

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

*7..काशी विश्वनाथ...*

 



विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

*8..त्र्यंबकेश्वर....*

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मा गिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

*9..वैद्यनाथ...*

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।

*10..नागेश्वर ज्योतिर्लिंग*

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

*11..रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग*


यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

*12..धृष्णेश्वर मन्दिर*
घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के संभाजीनगर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे धृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।


लक्ष्मणजी के त्याग के बारे में कोई नहीं जानता अद्भुत पौराणिक कथा रामायण tellers.live

लक्ष्मणजी के त्याग के बारे में कोई नहीं जानता अद्भुत पौराणिक कथा रामायण tellers.live



हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसारभर में गाई जाती है। लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी। लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्रीराम कथा पूर्ण नहीं है।
अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया।

भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा।

अगस्त्य मुनि बोले-

श्रीराम, बेशक रावण और कुंभकर्ण भी प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाद ही था। उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था। ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे। लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए।

श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वे खुश थे। फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था।

अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था, जो..

* बारह वर्षों तक न सोया हो,
* जिसने बारह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और
* बारह साल तक भोजन न किया हो।

श्रीराम बोले- परंतु मैं वनवास काल में बारह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा। मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो और बारह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है?

अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए। प्रभु से कुछ छुपा है भला। दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो।

अगस्त्य मुनि ने कहा- क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए।

लक्ष्मणजी आए। प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा।

प्रभु ने पूछा- हम तीनों 14 वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा?

फल दिए गए, फिर भी अनाहारी कैसे रहे? और 14 साल तक सोए नहीं? यह कैसे हुआ?

लक्ष्मणजी ने बताया- भैया, जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा। आपको स्मरण होगा कि मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था, क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं।

14 वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए- आप और माता एक कुटिया में सोते थे। मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था। निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था।

निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह 14 साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी। आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था।

अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था, आप उसके तीन भाग करते थे। एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे कि लक्ष्मण फल रख लो। आपने कभी फल खाने को नहीं कहा, फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे? मैंने उन्हें संभालकर रख दिया। सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे।

प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया। फलों की गिनती हुई, तो सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे।

प्रभु ने कहा- इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?

लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया कि उन सात दिनों में फल आए ही नहीं...
 



इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी। विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या। उसके प्रयोग से मैं 14 साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया।

भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें हृदय से लगा लिया।

Why bamboo is established in Bhagwat Katha -भागवत कथा में बांस की स्थापना क्यों की जाती है tellers.live





 

जब महात्मा गोकर्ण जी ने महाप्रेत धुंधुकारी के उद्धार के लिए श्रीमद् भागवत की कथा सुनायी थी, तक धुंधुकारी के बैठने के लिए कोई बांस की अलग से व्यवस्था नहीं की थी। बल्कि उसके बैठने के लिए एक सामान्य आसान ही बिछाया गया था।

महात्मा गोकर्ण जी ने धुंधुकारी का आह्वान किया और कहा - "भैया धुंधुकारी ! आप जहाँ कहीं भी हों, आ करके इस आसान पर बैठ जाईये। यह भागवत जी की परम् पवित्र कथा विशेषकर तेरे लिए ही हो रही है। इसको सुनकर तुम इस प्रेत योनि से मुक्त हो जाओगे। अब धुंधुकारी का कोई शरीर तो था नहीं, जो आसन पर स्थिर रहकर भागवत जी की कथा सुन पाते। वह जब जब आसन पर बैठने लगता, हवा का कोई झोंका आता और उसे कहीं दूर उड़ाकर ले जाता। ऐसा उसके साथ बार-बार हुआ।

वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाये कि मुझे हवा उड़ा ना पाए और मैं सात दिन तक एक स्थान पर बैठकर भागवत जी की मंगलमयी कथा सुन पाऊँ, जिससे मेरा उद्धार हो जाये और मेरी मुक्ति हो जाये। वह सोचने लगा कि मेरे तो अब माता-पिता भी नहीं हैं, जिनके भीतर प्रवेश करके या उनके माध्यम से मैं कथा सुन पाता। वो भी मेरे ही कारण मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं।

मेरे परिवार का तो कोई सदस्य भी नहीं बचा, जिनके माध्यम से मैं भागवत जी की मोक्षदायिनी कथा सुन पाऊँ। अब तो सिर्फ मेरे सौतेले भाई महात्मा गोकर्ण ही बचे हैं। जिनका जन्म गऊ माता के गर्भ से हुआ है। लेकिन उनके अन्दर मैं कैसे प्रवेश कर सकता हूँ, क्योंकि वो तो पवित्र व्यास पीठ पर बैठकर मुझे परमात्मा की अमृतमयी कथा सुनाने के लिए उपस्थित हैं।

वह धुंधुकारी महाप्रेत ऐसा विचार कर ही रहा था कि उसने देखा जहाँ व्यास मंच बना हुआ है, वहाँ बांस का एक बगीचा भी है और उसकी नजर एक सात पोरी के बांस पर पड़ी। यह सोचकर कि बांस में हवा का प्रकोप नहीं होगा, सो वह बांस के अन्दर प्रवेश कर गया और बांस की पहली पोरी में जाकर बैठ गया।

पहले दिन की कथा के प्रभाव से बांस की पहली पोरी चटक गयी । धुंधुकारी दूसरी पोरी में जाकर बैठ गया। दूसरे दिन की कथा के प्रभाव से दूसरी पोरी चटक गयी। धुंधुकारी तीसरी पोरी में जाकर बैठ गया। ऐसे ही प्रतिदिन की कथा के प्रभाव से क्रमशः बांस की एक-एक पोरी चटकती चली गयी।


 


और जब अन्तिम सातवें दिन की कथा चल रही थी तो धुंधुकारी महाप्रेत भी अन्तिम सातवीं पोरी में ही बैठा हुआ था। अब जैसे ही अन्तिम सातवें दिन भागवत जी की कथा का पूर्ण विश्राम हुआ तो बांस बीच में से दो फाड़ हो गया और धुंधुकारी महाप्रेत देवताओं के समान शरीर धारण करके प्रकट हो गया।

उसने हाथ जोड़कर बड़े ही विनय भाव से महात्मा गोकर्ण जी का धन्यवाद किया और कहा - "भैया जी ! मैं आपका शुक्रिया किन शब्दों में करुँ ? मेरे पास तो शब्द भी नहीं हैं। आपने जो परमात्मा की मंगलमयी पवित्र कथा सुनाई, देखो उस महाभयंकर महाप्रेत योनि से मैं मुक्त हो गया हूँ

और मुझे अब देव योनि प्राप्त हो गयी है। आपको मेरा बारम्बार प्रणाम् तभी सबके देखते-देखते धुंधुकारी के लिए भगवान के धाम से सुन्दर विमान आया और धुंधुकारी विमान में बैठकर भगवान के धाम को चले गए।

सही मायने में सात पोरी का बांस और कुछ नहीं, हमारा अपना शरीर ही है। हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र हैं।

मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहद चक्र,विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र।

यदि किसी योग्य गुरु के सानिध्य में रहकर प्राणायाम का अभ्यास करते हुए मनोयोग से सात दिन की कथा सुनें तो उसको आत्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है और उसकी कुण्डलिनी शक्ति पूर्णरुप से जागृत हो जाती है। इसमें कोई शक नहीं है। यह सात पोरी का बांस हमारा ही शरीर है।

Antique Tribal Art - Indian Folk And Tribal Art-tellers.live

India is currently separated into states and association regions, which have their own interesting social and conventional characters. Each locale has its style and workmanship known as society craftsmanship. Aside from society craftsmanship, there is a workmanship which was generally polished by the individuals of rustic and innate populaces which is known as the court workmanship. These crafts of India are basic yet charming. They tell about the extravagance of the nation's legacy.

 

 
Ancestral craftsmanship depicts the creative vitality showed by the inborn and the provincial. The inborn and people speciality of India incorporates different works of art, for example, artistic creations, makes, crafted works. Some of them are recorded beneath: 










 


Tanjore Art are the artworks from the parts Rajasthan, Bengal, Gujarat that portray the fantasies and legends of nearby saints and divinities. These works of art are narrating pictures. Their subjects are fanciful.

 
























Warli Painting originates from the biggest clan on the northern edges of Bombay. Maharashtra is known for its Warli craftsmanship. These works of art are not a portrayal of fanciful characters or gods but rather delineate the public activity of the individuals. The work of art is attracted by spots utilizing ideally white shading. These works of art are holy and marriage couldn't occur without them. 
















 
Madhubani Painting is otherwise called the Mithila craftsmanship and is a foundation of the area Bihar. It is a line drawing loaded up with brilliant differentiating hues. It is done on naturally put or mud dividers. 

 


Patachitra or Pattachitra painting, as the name proposes is painting done on canvas. Patta implies canvas and Chitra mean work of art. It is the most established and most well-known type of craftsmanship rose up out of Bengal and Odisha. It is shown by rich vivid application, imaginative themes and plans, and depiction of straightforward subjects, for the most part fanciful in a portrayal.

 





 
Rajasthani Miniature Paintings came to India through the Mughals. These artistic creations are made with the most extreme consideration, every single moment detail is dealt with, it has lines, particulars and wonderful splendid hues set in an excellent example. Today, numerous specialists make scaled-down compositions on silk, ivory, cotton, and paper. 
















Kalamezhuthu is the drawing usually known rangoli, kolam which is drawn at the passage of the sanctuaries and homes. It is workmanship drilled at the floors and forests of the sanctuaries portraying the god in the sanctuary. In each painting, the examples the moment subtleties, measurements and shading decision are chosen in recognition with severe standards. The examples change extensively relying upon the event

 

महादेव के पिनाक धनुष की कथा

भगवान श्री राम ने सीता जी के स्वयंवर में गुरु विश्वामित्र जी की आज्ञा से शिवजी का कठोर धनुष तोड़ कर सीता जी से विवाह किया था। लेकिन शिवजी का...