राजा भंगस्वाना की कथा -www.tellers.live पौराणिक हिंदी कहानियां-रोचक हिंदी कहानियां


राजा भंगस्वाना की कथा -www.tellers.live पौराणिक हिंदी कहानियां-रोचक हिंदी कहानियां


बहुत समय पहले भंगस्वाना नाम का एक राजा रहता था। वह न्यायप्रिय और बहुत यशस्वी था लेकिन उसके कोई पुत्र नहीं था।

एक बालक की इच्छा में उस राजा ने एक अनुष्ठान किया जिसका नाम था ‘अग्नीष्टुता’। उस हवन में केवल अग्नि भगवान का आदर हुआ था इसलिए देवराज इन्द्र काफी क्रोधित हो गए। इंद्र अपने गुस्से को निकालने के लिए एक मौका तलाशने लगे ताकि राजा भंगस्वाना से कोई गलती हो और वह उसे दण्ड दे सकें। पर भंगस्वाना इतना अच्छा राजा था की इन्द्र को कोई मौका नहीं मिल रहा था जिस कारण से इन्द्र का गुस्सा और बढ़ता जा रहा था।

एक दिन राजा शिकार पर निकला, इन्द्र ने सोचा ये सही समय है और अपने अपमान का बदला लेने का और इन्द्र ने राजा को सम्मोहित कर दिया। राजा भंगस्वाना जंगल में इधर-उधर भटकने लगा। अपनी सम्मोहित हालत में वह सब सुध खो बैठा, ना उसे दिशाएं समझ आ रही थीं और ना ही अपने सैनिक नहीं दिख रहे थे।

भूख-प्यास ने उसे और व्याकुल कर दिया था। अचानक उसे एक छोटी सी नदी दिखाई थी जो किसी जादू सी सुन्दर लग रही थी। राजा उस नदी की तरफ बढ़ा और पहले उसने अपने घोड़े को पानी पिलाया, फिर खुद पिया। जैसे ही राजा ने नदी के अन्दर प्रवेश किया और पानी पिया, उसने देखा की वह बदल रहा है। धीरे-धीरे वह एक स्त्री में बदल गया।

शर्म से बोझल वह राजा जोर-जोर से विलाप करने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था की ऐसा उसके साथ क्यों हुआ। राजा भंगस्वाना सोचने लगा, हे प्रभु ! इस अनर्थ के बाद में कैसे अपने राज्य वापस जाऊँगा ? मेरे अग्नीष्टुता अनुष्ठान से मेरे 100 पुत्र हुए हैं उन्हें मैं अब कैसे मिलूँगा, क्या कहूँगा ? मेरी रानी, महारानी जो मेरी प्रतीक्षा कर रहीं हैं, उनसे कैसे मिलूँगा ? मेरे पौरुष के साथ-साथ मेरा राज-पाट सब चला जाएगा, मेरी प्रजा का क्या होगा, इस तरह से विलाप करता राजा अपने राज्य वापस लौटा।

स्त्री के रूप में जब राजा वापस पहुँचा तो उसे देख कर सभी लोग अचंभित रह गए। राजा ने सभा बुलाई और अपनी रानियों, पुत्रों और मंत्रियों से कहा की अब मैं राज-पाट संभालने के लायक नहीं रहा हूँ, तुम सभी लोग सुख से यहाँ रहो और मैं जंगल में जाकर अपना बाकी का जीवन बिताऊँगा। ऐसा कह कर वह राजा जंगल की तरफ प्रस्थान कर गया।

वहाँ जाकर वह स्त्री रूप में एक तपस्वी के आश्रम में रहने लगी जिनसे उसने कई पुत्रों को जन्म दिया। अपने उन पुत्रों को वह अपने पुराने राज्य ले गयी और अपने पुराने बच्चों से बोली, तुम मेरे पुत्र हो जब में एक पुरुष था, ये मेरे पुत्र हैं जब में एक स्त्री हूँ। मेरे राज्य को मिल कर, भाइयों की तरह संभालो। सभी भाई मिलकर रहने लगे।

सब को सुख से जीवन व्यतीत करता देख, देवराज इन्द्र और अधिक क्रोधित हो गए और उनमें बदले की भावना फिर जागने लगी। इन्द्र सोचने लगा कि ऐसा लगता है की राजा को स्त्री में बदल कर मैने उसके साथ बुरे की जगह अच्छा कर दिया है।

ऐसा सोच कर इन्द्र ने एक ब्राह्मण का रूप धारा और पहुँच गया राजा भंगस्वाना के राज्य में। वहाँ जाकर उसने सभी राजकुमारों के कान भरने शुरू कर दिए। इंद्र के भड़काने की वजह से सभी भाई आपस में लड़ पड़े और एक दूसरे को मार डाला।

जैसे ही भंगस्वाना को इस बात का पता चला वह शोकाकुल हो गया। ब्राह्मण के रूप में इन्द्र राजा के पास पहुँचा और पूछा की वह क्यों रो रही है। भंगस्वाना ने रोते-रोते पूरी घटना इन्द्र को बताई तो इन्द्र ने अपना असली रूप दिखा कर राजा को उसकी गलती के बारे में बताया।

इंद्र ने कहा, “क्योंकि तुमने सिर्फ अग्नि को पूजा और मेरा अनादर किया इसलिए मैने तुम्हारे साथ यह खेल रचा।” यह सुनते ही भंगस्वाना इन्द्र के पैरों में गिर गया और अपने अनजाने में किया अपराध के लिए क्षमा मांगी। राजा की ऐसी दयनीय दशा देख कर इन्द्र को दया आ गई। इन्द्र ने राजा को माफ करते हुए अपने पुत्रों को जीवित करवाने का वरदान दिया।

इंद्र बोले, “हे स्त्री रूपी राजन, अपने बच्चों में से किन्ही एक को जीवित कर लो।”

भंगस्वाना ने इन्द्र से कहा अगर ऐसी ही बात है तो मेरे उन पुत्रों को जीवित कर दो जिन्हे मैने स्त्री की तरह पैदा किया है। हैरान होते हुए इन्द्र ने इसका कारण पूछा तो राजा ने जवाब दिया, “हे इन्द्र ! एक स्त्री का प्रेम, एक पुरुष के प्रेम से बहुत अधिक होता है इसीलिए मैं अपनी कोख से जन्मे बालकों का जीवन-दान माँगती हूँ।”

उसके बाद इन्द्र ने राजा को दुबारा पुरुष रूप देने की बात की। इन्द्र बोले, “तुमसे खुश होकर हे भंगस्वाना मैं तुम्हे वापस पुरुष बनाना चाहता हूँ।” पर राजा ने साफ मना कर दिया। स्त्री रुपी भंगस्वाना बोला, “हे देवराज इन्द्र ! मैं स्त्री रूप में ही खुश हूँ और स्त्री ही रहना चाहता हूँ।”

यह सुनकर इन्द्र उत्सुक हो गए और पूछ बैठे की ऐसा क्यों राजन, क्या तुम वापस पुरुष बनकर अपना राज-पाट नहीं संभालना चाहते ?” भंगस्वाना ने कहा देव, स्त्री रूप में मैने जिस सन्तुष्टि का अनुभव किया वह पुरुष रूप में कभी संभव नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

महादेव के पिनाक धनुष की कथा

भगवान श्री राम ने सीता जी के स्वयंवर में गुरु विश्वामित्र जी की आज्ञा से शिवजी का कठोर धनुष तोड़ कर सीता जी से विवाह किया था। लेकिन शिवजी का...