तीन महत्वपूर्ण प्रश्न www.tellers.live

 

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किसी राजा के मन में तीन प्रश्न अक्सर उठा करते थे जिनके उत्तर पाने के लिए वह अत्यंत अधीर था।

 

इसलिए उसने अपने राज्यमंत्री से परामर्श किया और अपने सभासदों की एक बैठक बुलाई। राजा ने उस सभा में जो अपने तीनों प्रश्न थे सबके सम्मुख रखे ; वे थे —

 

*1. सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य क्या होता है ?*

 

*2. परामर्श के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कौन होता है ?*

 

*3. किसी भी निश्चित कार्य को करने का महत्त्वपूर्ण समय कौन सा होता है?*

 

कोई भी सभासद मंत्री राजा के प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नही दे पाया लेकिन उस सभा में राजा को एक ऐसे सन्यासी साधु के बारे में पता चला जो सुदूर जंगल में एक कुटिया में रहते थे और सबकी जिज्ञासा का समाधान करने में समर्थ थे।

 

राजा भी साधारण वेष में अपने कुछ सैनिकों एवं गुप्तचरों को साथ लेकर चल दिया उस सन्यासी साधु के दर्शन के लिए | दिल में एक ही आस थी कि अब उसे अपने प्रश्नों के उत्तर अवश्य ही मिल जायेंगे।

 

जब वे सब सन्यासी की कुटिया के समीप पहुंचे तो राजा ने अपने सभी सैनकों एवं गुप्तचरों को कुटिया से दूर रहने का आदेश दिया और स्वयं अकेले ही आगे बढ़ने लगा।

 

राजा ने देखा कि अपनी कुटिया के समीप ही सन्यासी साधु खेत में कुदाल चला रहे हैं। कुछ ही क्षणों में उनकी दृष्टि राजा पर पड़ी । कुदाल चलाते-चलाते साधु राजा से उसके आने का कारण पूछा और राजा ने भी बड़े आदर से अपने वही तीनों प्रश्न सन्यासी साधु को निवेदित कर दिए।

 

राजा अपने प्रश्नों के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा लेकिन यह क्या ? साधु ने तो उत्तर देने की जगह राजा को उसकी कुदाल लेने का संकेत कर डाला और राजा भी कुदाल लेकर खेत जोतने लगा। आख़िरकार राजा को अपने प्रश्नों के उत्तर भी तो चाहिए थे |

 

राजा के खेत जोतते- जोतते संध्या हो गयी। इतने में ही एक घायल व्यक्ति जो खून से लथपथ था और जिसके पेट से खून की धार बह रही थी, उस साधु की शरण लेने आया। अब साधु और राजा दोनों ने मिलकर आपसी परामर्श से उस घायल की मरहम पट्टी की। दर्द से कुछ राहत मिली तो घायल सो गया।

 

प्रातः जब वह घायल आगंतुक राजा से क्षमायाचना करने लगा तो राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। आगन्तुक राजा की स्थिति देख तत्काल अपना परिचय देते हुए बोला –राजन “कल तक आपको मैं अपना घोर शत्रु मानता था क्योंकि आपने मेरे भाई को मृत्युदंड दिया था।

 

में तब से बदले का अवसर ढूढ़ता रहता था। कल मुझे पता लग गया था कि आप साधारण वेषभूषा में इस साधु के पास आये हैं। आपको मारने के उद्देश्य से मैं यहाँ आया था और एक झाड़ी के पीछे छिपकर बैठा था लेकिन आपके गुप्तचर मुझे पहचान गये और घातक हथियारों से मुझे चोट पहुँचाई.. लेकिन आपने अपना शत्रु होने के बावजूद भी मेरे प्राणों की रक्षा की। परिणाम स्वरूप मेरे मन का द्वेष समाप्त हो गया है |

 

अब मैं आपके चरणों का सेवक बन गया हूँ | आप चाहे दण्ड दें अथवा मुझे क्षमादान दें, यह आपकी इच्छा।”

 

घायल की बात सुनकर राजा स्तब्ध रह गया और मन ही मन इस अप्रत्याशित ईश्वरीय सहयोग के लिए प्रभु का धन्यवाद करने लगा। सन्यासी साधु मुस्कराया और राजा से कहने लगा

 

–“राजन्, क्या अभी भी आपको अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले ?”

 

राजा कुछ दुविधा में दिखाई दे रहा था इसलिए सन्यासी ने ही बात आगे बढ़ाई – ‘आपके पहले प्रश्न का उत्तर है —सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वही होता है जो हमारे सामने होता है ; जैसे आपने मुझे खेत जोतने में सहयोग दिया | यदि आप मुझे सहानुभूति न दिखाते तो आपके जीवन की रक्षा न हो पाती ।

 

आपका दूसरा प्रश्न था कि-"परामर्श के लिए कौन महत्त्वपूर्ण होता है जिसका उत्तर आपको स्वयं ही मिल चुका है कि जो व्यक्ति हमारे पास उपस्थित होता है, उसी से परामर्श मायने रखता है। जैसे उस घायल व्यक्ति को सहायता की आवश्यकता थी जिसके प्राण आपने बचाये। इस तरह आपका शत्रु भी आपका मित्र बन गया।

 

तीसरे प्रश्न का उत्तर यही है कि किसी भी निश्चित कार्य को करने का महत्त्वपूर्ण समय होता है “अभी (तत्काल)” |

 

*शिक्षा:-* यह कहानी हमें सावधान करती है कि वर्तमान के महत्त्व को कभी भी नहीं भूलना चाहिए | भविष्य की चिंता में वर्तमान यदि बिगड़ गया तो हम हाथ ही मलते रह जायेंगे | प्रस्तुत कार्य को मनोयोग से करना अथवा समय का सदुपयोग ही न केवल उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं की नींव होता है अपितु यही सर्वांगीण प्रगति का मूलमंत्र भी है!

 

 दुःख ईश्वर का प्रसाद है

 

जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हे मृतुलोक जाना पड़ेगा,मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ.

 

ये सुन जीव की आँखों मे आंसू आ गए.वो बोला प्रभु कुछ तो ऐसा करो की मे लौटकर आपके पास ही आऊ. भगवान को दया आ गई. उन्होंने दो बाते की जीव के लिए.

 

पहला संसार की हर चीज़ मे अतृप्ति मिला दी, कि तुझे दुनिया मे कुछ भी मिल जाये तू तृप्त नहीं होगा.

 

तृप्ति तुझे तभी मिलेगी जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से मे थोडा-थोडा दुःख मिला दिया कि हम लौट कर ईश्वर के पास ही पहुचे.

 

इस तरह हर किसी के जीवन मे थोडा दुःख है. जीवन मे दुःख या विषाद हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए है,

 

लेकिन हम चूक जाते है. हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता है, हम भागते है ज्योतिष के पास,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास. कुछ होने वाला नहीं.

 

थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस. यदि दुखो से घबराये नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढे तो बात बन जाती है.

 

यदि हम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती है और जीव दुखो से भी पार हो जाता है.

 

दुःख तो ईश्वर का प्रसाद है. दुखो का मतलब है, ईश्वर का बुलावा है. वो हमें याद कर रहा है पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका है.

 

हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार मे हर चीज़ मे अतृप्ति है और दुःख और विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन है..!!


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